प्रेम ममता त्याग समर्पण
लेकर जो जन्मी हैं
रूडी परंपरा से दबकर
हर बार नारी छली है
बंदी रही कितने बंधनों में
घुटती रही है घरों में
कीमत उसकी शुन्य करके भी
वह सदा अनमोल रही है
उड़ रही है आसमानों में फिर भी
ममता की दौर से बंदी हुई है
चलती रहती है साथ फेरों में
घुटन भरी आज भी जी रही है
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