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अपने दिल की गहराई तक।

                
                                                         
                            मर्दों ने पहाड़ तोड़े,
                                                                 
                            
जंग पे गए,
ऊँची दीवारें बनाई,
कोयले की खदानों में गए,
धूप में तपे,
चाँद तक जा पहुँचे,
मकान बनाए,
सरहदों पे लड़े।

पर जा न सके,
जा न सके
अपने दिल की गहराई तक।

तोड़ न पाए
अपने दिल का पत्थर,
गिरा न पाए
अपने अंदर की कठोरता को,
जीत न पाए
अपनी ज़िम्मेदारियों के बोझ से।

न खुल के रो पाए,
न ज़िम्मेदारियों से भाग पाए।

उम्र गुज़ार दी
पैसे कमाने में,
उस पैसे से
अपनी पहचान बनाने में।

पर मैं सोचती हूँ,
मैं सोचती हूँ—

अगर वो पिघला देते
अपनी कठोरता को,
और गिरा देते
अपने आँसुओं को
थोड़ा खुलकर,

तो ये जंग भी शायद
उनके लिए थोड़ी कम हो जाती।

तो ये दुनिया भी शायद
उनके लिए थोड़ी
नरम हो जाती।

शायद मर्दों को
इतने पहाड़
तोड़ने की ज़रूरत ही
न पड़ती।

शायद
वो भी कभी-कभी
थक कर बैठ पाते,
खुलकर रो पाते,

और मर्द होने से पहले
सिर्फ़ इंसान हो पाते।
- जया जायसवाल
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एक घंटा पहले

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