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'बचपन की यादें'

                
                                                         
                            जब बचपन की, याद सताती,
                                                                 
                            
खुशी से मन में, हलचल होती।
काश ये, बचपन की दुनिया,
फिर से मेरी, लौट आती।

जब बचपन की याद सताती..

सुबह सवेरे माँ जब हमको,
प्यार से आकर जगाती।
"कर लो तुम पढ़ाई" कहकर,
हर रोज़ थी वह मनवाती।

जब बचपन की याद सताती..

चाँद सितारों की, जब दादी,
किस्से हमें सुनाती।
सात बहनों की, प्यार की गाथा,
वह हमको बतलाती।

जब बचपन की याद सताती..

मार पिटाई, लुक्का-छुप्पी,
संग में जब, हम खेलते।
पास-पड़ोस की, गलियों में हम,
शोर शराबा खूब करते।

जब बचपन की याद सताती..

कभी लड़ाई, करके हम,
कट्टी हो जाया करते।
कुछ दिनों के बाद, फिर से
एक हो जाया करते।

जब बचपन की याद सताती..

जब स्कूल से, घर में आते,
बस्ता फेंक कर, खाना खाते।
संग में हम, इकट्ठे होकर,
गिल्ली-डंडे का, खेल खेलते।

जब बचपन की याद सताती..

सोचता हूँ अब, अपने मन में,
कहां गये वह, प्यारे दिन।
बस यही, यादों में मेरे,
जाने कट गए, कितने दिन।

जब बचपन की याद सताती..
- जगदीश भंडारी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 घंटे पहले

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