'दिल' कहता है प्यार का ख़ुमार है,
दिमाग़ कहता है मौसमी बुख़ार है।
बैठे हैं हम भी इसी कश्मकश में,
जो भी है ये मर्ज़ जानलेवा असरदार है।
उसने पूछा कैसी कट रही हैं रातें,
हमने कहा बस हिज्र की तपिश बे-शुमार है।
नींद तो मुद्दतों पहले रुख़सत हुई,
अब आँखों में जागती हर सेहर का इंतज़ार है।
'दिल' तो समझता है इसे क़ुदरत की इनायत,
अक़्ल जानती है यह ख़ामोश सी तबाही का आसार है।
'दिल' के इस फ़ैसले पे हँसता है दिमाग़,
कि ये इश्क़ नहीं बस रूहानी बुख़ार है।
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