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हमको अपना ही समाज ले डूबा।

                
                                                         
                            हमको अपना ही समाज ले डूबा।
                                                                 
                            
लेन देन का नया रिवाज ले डूबा।

कभी रक्षा बंधन कभी दीवाली है।
हम सबकी कोढ़ में खाज ले डूबा।

किधर गए कहां जाना बाकी है?
आने जाने का ये काज ले डूबा।

कभी जन्म कभी सगाई शादी है।
आने जाने का कल आज ले डूबा।

दहेज लेना और देना दोनो पाप है।
दुल्हन देखने का मिजाज ले डूबा।

घर परिवार सुखी रहेगा कैसे भला।
सब एक दूसरे से नाराज ले डूबा।

सास बहू छत्तीस का आंकड़ा है।
दोनो का अपना मिजाज ले डूबा।

फक्कर होना वक्त की जरुरत है।
अपना यही हाल आज ले डूबा।

नामुमकिन है समाज को छोड़ना।
कायम किया जो सुराज ले डूबा।

सोहल इससे बचना मुश्किल है।
नाक बचाने का अंदाज ले डूबा।
-गुरदीप सिंह सोहल
 
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3 घंटे पहले

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