दिखावे की डीपी लगे, स्टेटस बटोरे संग।
भीतर भरा गुबार है, बाहर झूठा रंग॥
जलावन को जग को रचे, झूठी मौज दिखाय।
नींद चुरावे और की, आपहु कुढ़ता जाय॥
चेहरा हँसता देखकर, बैरी मरे रिसाय।
फजीहत कर थक गया, तोहु न पार बसाया॥
दुख को ढाँपे मुखौटा, झूठी हँसी दिखाव।
ठेंगा दुनिया को दिखे, भीतर गहरा घाव॥
डीपी का मर्म न जाने कोई, कागा समझे न कोय।
या समझे अंतर्यामी, या रब जाने होय॥
- प्रीति
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