ज़िंदगी के उस मोड़ पर मैं आ गया हूँ,
जहाँ मैं हँस तो लेता हूँ, मगर खुश नहीं होता।
वो देख कर मेरा यूँ मुस्कुराना दंग रह गया,
उसे क्या ख़बर, मेरे दिल का दर्द कम नहीं होता।
लबों पे हँसी है मगर आँखों में सन्नाटा,
हर एक ज़ख्म यहाँ यूँ ही बे-आवाज़ नहीं होता।
कभी जो हर बात पे खिल उठता था दिल मेरा,
अब किसी बात से भी ये दिल रोशन नहीं होता।
वो समझे भी तो कैसे "देव "मेरी ख़ामोशियों को,
हर दर्द लफ़्ज़ों में यूँ बयाँ नहीं होता।
लोग कहते हैं वक़्त हर घाव भर देता है,
पर हर एक ज़ख्म का मरहम यहाँ नहीं होता।
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