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सिंधु का ज्वार थी वो- सुषमा स्वराज जी को समर्पित

                
                                                         
                            मौत की आहट अक्सर ही जिंदगी को चुरा ले जाती है
                                                                 
                            
दुख होता है जब बेशकीमती कोहिनूर छीन ले जाती है
छल रहित करुणा और प्रेम की अविरल धारा थी वो
भारत भूमि के अम्बर का चमकता हुआ सितारा थी वो
भारतीय नारी के सशक्तीकरण की बड़ी मिसाल थी वो
विदेशों में फँसे हुए भारतीयों की रक्षा की ढाल थी वो
भारतीय मूल्यों की धारक ,जन मानस की पुकार थी वो
कर्मयोगी, सर्व हितैषी,अन्याय पर सिंधु का ज्वार थी वो
विदेश नीति और कूटनीति में जिसका कोई सानी नहीं
विपदा चाहे पहाड़ बनी हो, फिर भी हार कभी मानी नहीं
जब कश्मीर की व्यथा को बेबाक संसद में बोला था
नव परिवर्तन की लहर का कपाट उस दिन खोला था
केवल वो वक्ता ही नहीं,उनका सदा काम भी बोलता था
वाणी की मर्यादा में उनका संसद में नाम भी बोलता था
देशप्रेम से ओत प्रोत उस अबला को हम सब नमन करें
नमन करें उनके संस्कारों को, उनके कर्मों का वंदन करें


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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