आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आँखों मे हसीं तसव्वुर बना दे-पुरानी डायरी से

                
                                                         
                            मेरी आँखों मे एक हसीं तसव्वुर बना दे।
                                                                 
                            
मैं जो गुनगुनाना चाहूँ ऐसी ग़ज़ल बना दे।।

मेरी आँखों मे सजे है ख्वाब कई हसीन।
उन ख्वाबों को तू बस हकीकत बना दे।।

यूँ ही आ जायेगा का मजा जीने का यारों।
मेरे सीने में फिर कोई नया ज़ख्म बना दे।।

दोस्त तो बहुत मिले है इस जिंदगी में मुझे ।
जो हो सके तो अब कोई एक रकीब बना दे।।

ना रहेगा डर भी अब मौत का इन आँखों।
सामने मेरे तू उस कातिल की तस्वीर बना दे।।

वो घटाए वो बादल भी रह गए होंगे प्यासे।
चल आज फिर अश्कों का समन्दर बना दे।।

दर्द की चुभन सीने में रहेगी हरदम साथ ही।
आकर तू इस चुभन कुछ और तेज बना दे।।

वो गुमनाम रखता है तेरी हर खबर पे नजर।
उसकी उस नजर को तू मेरा मुक़द्दर बना दे।।
              - बृज मोहन सिंह बिष्ट
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
50 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर