आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सुलझा लूँ बस कुछ उलझे धागे

                
                                                         
                            रुक सको तो रुक जाना कुछ पल
                                                                 
                            
फिर बेशक़ बढ़ जाना आगे
बस गुज़र जाने दो ये चंद घड़ियां
फिर बेशक़ मुझको जग त्यागे
ना मेरे पास मेरी ख़ुशियां
ना मेरे साथ मेरी दुनियां
ठहर जाओ कुछ देर को बस
शायद मिल जाए राह मुझे आगे
ना कोई शिक़ायत फिर तुमसे
ना कोई गिला फिर इस जग से
चले जाना तुम अपने रस्ते
सुलझा लूँ बस कुछ उलझे धागे
रुक सको तो...।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर