नीले आसमां को भी है दर्द थोड़ा सा कहीं
छुपा रखा है उन्हें काले बादलों में कहीं
वो बरसते हैं जो बूँद बनकर के कभी
है संभालती उन्हें आँचल में ज़मीं
कहे तो कहे किस से ही वो भला
रहा ख़ुद उसे सूरज जला
ना चाँद न तारे ही उसके हुए
पर नज़र कहां आती किसी को उसकी ख़ला
है तड़पता वो भी दिन रात है
ग़म बाँटने को पर न कोई साथ है
कैसा है क़ुदरत का इंसाफ़ ये
खुशियां बांटने वाला ही ख़ाली हाथ है
पर गिला भी करे तो कैसे करे
इसमें भी तो उसकी तौहीन है
अनगिनत नगीने जिसके दामन में लगे
क्या वो भी इतना दीन है
इन्हीं कश्म-ओ-कश में बेचारा जी रहा
बयाँ नज़रों से भी कर सकता नहीं
नीले आसमां को भी है...।
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