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एक ओणम-स्मृति : उत्सव की गंध

                
                                                         
                            मेरे पिता को
                                                                 
                            
इंडियन-स्टाइल शौचालय से
इतना डर लगता था
कि उनके उस “कुंभ” के लिए
घर का गड्ढेवाला शौचालय ही
सबसे सुरक्षित ठिकाना था।

इसलिए “सद्या”
यानी ओणम की दावत का नाम सुनते ही
उनके भीतर एक डर-सा जाग उठता था।

आज भी
जब कोई कहता है, “ओणम आ रहा है,”
तो फूलों की रंगोली से पहले
स्मृति में उभरती है
वही पुरानी नाटप्पेड़ी —
उस गंध का डर!

न दावत का मोह,
न उत्सव का उल्लास,
बस एक पुरानी स्मृति
नाक पकड़कर खड़ी हो जाती है!
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8 घंटे पहले

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