ओ खाकी तुम इतनी सुंदर कैसे हो ?
तुम्हें काया पर चढ़ाते ही रूप बदल सा जाता है ।
ओ खाकी तुम इतनी निष्पक्ष कैसे हो ?
तुम्हारे सामने आते ही मन सोच में पड़ जाता है।
ओ खाकी तुम इतनी बेदाग कैसे हो ?
तुम्हारे पास जाते ही रंगों की पहचान भूल सी जाती हूँ।
ओ खाकी तुम इतनी दयावान कैसे हो ?
तुम्हारे सामने पापी भी नतमस्तक सा हो जाता है।
ओ खाकी तुम इतनी प्रबल कैसे हो ?
तुम्हारे सामने बड़ा व्यक्तित्व भी छोटा हो जाता हैं ।
ओ खाकी तुम इतनी पाबंद कैसे हो ?
तुम्हारे साथ मैं आज़ाद हो जाती हूँ ।
ओ खाकी.. ओ खाकी..
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