आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

खाकी वर्दी...

                
                                                         
                            ओ खाकी तुम इतनी सुंदर कैसे हो ?
                                                                 
                            
तुम्हें काया पर चढ़ाते ही रूप बदल सा जाता है ।
ओ खाकी तुम इतनी निष्पक्ष कैसे हो ?
तुम्हारे सामने आते ही मन सोच में पड़ जाता है।
ओ खाकी तुम इतनी बेदाग कैसे हो ?
तुम्हारे पास जाते ही रंगों की पहचान भूल सी जाती हूँ।
ओ खाकी तुम इतनी दयावान कैसे हो ?
तुम्हारे सामने पापी भी नतमस्तक सा हो जाता है।
ओ खाकी तुम इतनी प्रबल कैसे हो ?
तुम्हारे सामने बड़ा व्यक्तित्व भी छोटा हो जाता हैं ।
ओ खाकी तुम इतनी पाबंद कैसे हो ?
तुम्हारे साथ मैं आज़ाद हो जाती हूँ ।
ओ खाकी.. ओ खाकी..
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर