शिक्षा की सामग्री हूं मैं,
शिक्षक की सहायक हूं मैं,
अक्षरों को समाहित करती,
निरक्षर को साकार करती,
जीवन पर्यंत न कोई भोले मुझको,
श्यामपट् कहते हैं मुझको,
मैं विद्यालय की आन हूं,
कक्षा की शान हूं,
सभी गुणों की खान हूं,
समझ लो मुझसे,
जो समझना हो जिसको,
क्योंकि श्यामपट कहते हैं मुझको,
चाक से है मेरा गहरा नाता,
हर रंग में है यह आता,
सच कहूं तो है मेरा भ्राता,
चाक से ना कोई बैर,
और ना कोई शिकायत है मुझको,
क्योंकि श्यामपट कहते हैं मुझको,
बेशक हर रंग में है चाक,
मैं तो श्याम रंग में रंगी हूं,
अस्थिर है यह हाथों में,
पर मैं स्थिर दीवार में टंगी हूं,
कठोरता से पकड़ कर इसको,
प्यार से लिखते हैं मुझको,
क्योंकि श्यामपट कहते हैं मुझको,
आज समय के साथ,
मुझमें भी परिवर्तन आया है,
क्योंकि आधुनिकता का असर,
हम सब पर छाया है,
आज मैं श्यामपट से,
हरित श्वेत में आने लगी,
बुनियादी और आधुनिकता का दौर,
मैं भी समझाने लगी,
इतने बदलाव के बाद भी,
मेरी वास्तविकता वही है,
दीवारों में ही,
मेरी स्थिरता सही है,
आज जो लोग मुझे मोड़ कर,
बैसाखीयों का सहारा देते हैं,
अल्प आकार करके मेरा,
क्या अल्प ज्ञान देते हैं,
मैं खुश हूं कि,
आज मेरी जगह,
कोई और ले रहा है,
नए-नए तरीकों से,
सजीव ज्ञान दे रहा है,
एक विनती है मेरी उनसे,
कि वे शिक्षा की मौलिकता बनाए रखें,
आधुनिकता की चकाचौंध में,
छात्रों को अंधकार में ना ले जाएं,
मेरा तो अस्तित्व लगभग जाता रहा,
गर पूछें आने वाली पीढ़ी,
कि क्या कहते हैं इसको,
तो गर्व से बतलाना उनको,
श्यामपट कहते थे इसको,
श्यामपट कहते थे इसको।
ANURAG YADAV
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