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गाँधी

                
                                                         
                            हमको ही नहीं ,ये ज़माने को भी पता है ,
                                                                 
                            

बापू ही एकमात्र हमारे राष्ट्रपिता हैं ,

दिल्ली में राजघाट जिनकी है समाधी ,

वो हैं हमारे प्यारे महात्मा ग़ांधी ,

हुआ अवतार उनका गुजरात पोरबन्दर ,

था हिरदय उनका अथाह प्रेम समंदर ,

हुई घर पर ही उनकी शिक्षा -दीक्षा ,

सर्वस्व लुटाया सदा उन्होंने अपना ,

कभी न की कुछ पाने की इच्छा ,

भविष्य अपना सवांरने वो गए परदेश ,

बनकर बैरिस्टर वो आये स्वदेश ,

विदेशी सूट-बूट न उनको भाया ,

स्वदेशी परिधान उन्होंने अपनाया ,

"स्वदेशी बनो स्वदेशी रहो ,

जन-जन ये नारा पहुँचाया ,

विदेशी-वस्त्र दहन अभियान चलाया ,

वे सत्य और अहिंसा के थे पुजारी ,

तीन थे जिनके आदर्श बन्दर दरबारी ,

प्रेम ,दया और करुणा का भाव ,

ऐसा था उनका प्यारा स्वाभाव ,

वे जीवन में कभी डरे नहीं थे ,

जीते-जीते वे मरे नहीं थे ,

न उन्होंने अन्याय के आगे झुकना सीखा ,

बढ़ाते ही गये वे कदम अपने ,

न उन्होंने कभी रुकना सीखा ,

परतंत्रता की बेड़ियों से ,

बंध गया था ये देश ,

वे जब गये सहायक बन परदेश ,

फिर उन्होंने इक पल भी न बिलम्ब किया ,

उन्होंने तुरंत स्वदेश आगमन किया ,

आकर देश उन्होंने जन-संगठन बनाया,

'करो या मरो ' ये नारा लगाया ,

जन-संपर्क जन-अभियान से जोड़ा ,

मिलकर साथ नमक कानून तोड़ा ,

फिर कई अभियान ,कई आंदोलन हुये ,

देशप्रेमी , देशभक्त एक जुट हुये ,

अंग्रेजो भारत छोड़ो , भारत छोड़ो ,

अपने कदमों को वापस मोड़ो ,

इस तरह लगे और भी कई नारे ,

और जन-जन के हुए बापू प्यारे ,

फिर हुआ सिलसिला शहीदों का शुरू ,

हुये शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ,

न जाने कितनी ही कुर्बानियाँ हुई देश के लिए ,

कई दिये बलिदान स्वतंत्र स्वदेश के लिए ,

गाँधी बनकर ढाल अडिग अड़े रहे ,

अंग्रजों के आगे वे हर पल खड़े रहे ,

फिर अहिंसा ने हिंसा को हरा दिया ,

देश की आक्रोश निगाहों ने ,

अंग्रेजों को डरा दिया ,

और जब हर जन सरफिरा दीवाना हुआ ,

तब कहीं जाकर अंग्रेज अपने देश रवाना हुआ ,

स्वतंत्रता की बहे बयार ,

ये गांधीजी का सपना था ,

और इस अभियान में ,

जन-जन उनका अपना था ,

थमाकर नन्हें हाथों में आज़ादी ,

प्यारे बापू शहीद हो गये ,

कहकर शब्द वे हे !राम ,

पतित पावन पुनीत हो गये।


:- अनुराग यादव


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6 वर्ष पहले

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