शाम ढली और रात हो ही रही थी कि सामने भोलेनाथ के मंदिर से झाल- मंजीरे बजे खूब।
और उधर आसमान रौशन हुआ पूर्णिमा के चाँद से।
मंदिरों से आते शंखों की आवाजों ने जैसे अलविदा कहा, सावन की इस आखिरी रात को!
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