मैं अलग हूँ,
गलत नहीं।
भीड़ का हिस्सा बनना मेरी फ़ितरत नहीं,
क्योंकि मुझे पता है लोकतंत्र भी गलत हो सकता है।
मैं बनी-बनाई पगडंडी नहीं चुन सकती,
क्योंकि मुझे नई पगडंडी बनाकर चलना पसंद है।
नई राहों पर साज़िश के काँटे नहीं होते,
बंजर पर हर काँटे को रौंदकर अलग राह बनाने का जुनून कुछ और है।
मैं अलग हूँ,
गलत नहीं।
क्योंकि तुम-सी नहीं सोच मेरी,
तुम्हारी हर 'हाँ' में नहीं 'हाँ' मेरी।
मैं दिखावा कम करती हूँ,
लिंग भेदभाव, जाति-पाति—हर
शोषण का विरोध करती हूँ।
मैं तीन तलाक पर बोलती हूँ,
कन्या भ्रूण हत्या का विरोध करती हूँ,
सती प्रथा का त्याग करती हूँ,
हर अपमान का हिसाब करती हूँ।
मैं केवल इतिहास की बेड़ियों को नहीं काटती,
मैं आज के दौर के डिजिटल पाखंड को भी नकारती हूँ।
जहाँ सोच को कैद किया जाता है स्क्रीन के पीछे,
मैं उस अदृश्य गुलामी के खिलाफ आवाज़ उठाती हूँ।
मैं धर्म और सियासत के नाम पर बँटती नहीं,
सच्चे लोकतंत्र के खोते जा रहे मूल्यों पर बोलती हूँ।
मेरे लिए पहले इंसान बड़ा है,
समाज तो हमसे बना है।
मुखर होकर हर कुरीति के खिलाफ बोलती हूँ,
इसलिए मैं समाज की नजरों में खटकती हूँ।
-अनुराधा कामेंद्र साहनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X