उम्र की ढलती साँझ में,
जीवन कहाँ ठहरता है,
अनुभवों की धूप लिए मन,
अब भी कुछ कर सकता है।
हाथों में भले कंपन हो,
पर हुनर अभी जीवित है,
बीते वर्षों की सीखों में,
अनुभवों की पूँजी है।
क्यों मानें उनको निर्भर,
क्यों समझें बोझ किसी को?
उनकी प्रतिभा राह दिखाए,
आज भी कितने जन को।
कलम उठाएँ, गीत रचें वे,
बच्चों को शिक्षा दें,
कला, हुनर या अपने अनुभव से,
नव पीढ़ी को दिशा दें।
थोड़ी-सी आर्थिक क्षमता,
कितना सम्मान दिलाती है,
अपने निर्णय लेने की शक्ति,
मन में रोशनी जगाती है।
बुज़ुर्गों को दया नहीं,
अवसर और सम्मान चाहिए,
उनके अनुभवों की दुनिया को,
नई दिशा और आस चाहिए।
परिवार बने उनका संबल,
समाज बढ़ाए हाथ,
सृजन से आत्मनिर्भर हों वे,
फिर क्यों हो जीवन निराश?
ढलती उम्र अंत नहीं है,
यह अनुभव का मान है,
स्वावलंबन से भरा जीवन,
हर बुज़ुर्ग की पहचान है।
आओ उनके हुनर को सींचें,
उन्हें नई उड़ान दें,
सृजन की ओर बढ़ते बुज़ुर्गों को,
आत्मनिर्भरता का सम्मान दें।
- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
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