हमारी शहर में यूं किरकिरी नहीं होती
किसी अपने की अगर मुखबिरी नहीं होती
शरीफ आदमी बेशक ही हम हुआ करते
हमारे साथ अगर दिल्लगी नहीं होती
तब्दीली आ रही है मगर रफ़्ता रफ़्ता
कोई कायापलट एकबारगी नहीं होती
खराब सी जरा मुझको भी लगती है दुनिया
ये होती जन्नत ,जरा जो मतलबी नहीं होती
मैं उसपे अपना दिलो जान निसार कर देता
वो जो पहचान कर भी अजनबी नहीं होती
नवाजिशें जो तेरे नजरों की इस घर होती
कोई दीवार स्याह, खुरदुरी नहीं होती
मंजिलें जिनको मिली उनको भी देखा हमने
कोई मंजिल कभी भी आखिरी नहीं होती
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