भेदभाव नहीं जिसके मन में,
सदा सुखी वह जग उपवन में।
*निःसंताप* वही है केवल,
स्वर्ग उसी के है जीवन में।।
जिसके मन में गरल भरा है,
कलह-क्लेश से कब उबरा है।
उठा-पटक में प्राण गवाँए,
मन बसता है केवल धन में।।
पुण्य धरा पर पुण्य कमाना,
भक्ति भाव में मन रम जाना।
धन्य वही जो त्याग करें कुछ,
प्रभु का नाम बसे धड़कन में।।
जिह्ला पर हो नाम का दीपक,
नहीं नाम सम दूजा हीरक।
ऊँचा भगवन के घर मस्तक,
भेद न जिसके मन आँगन में।।
-पंडित अनिल
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