थोड़ा ठहरिए साहिब , मैं अपने ज़ख्म सी रहा हूं
गैरों की बिसात नहीं थी , अपनों के
दिए आंसुओं को पी रहा हूं
थोड़ा ठहरिए साहिब ।
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