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मेरे अल्फाज़

स्त्री

Ajeet Yadav

27 कविताएं

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मैं अगर तुमसे कहूँ कि
तुमसे मुहब्बत है
पसंद करता हूँ
तो तुम्हें अच्छा लगते हुए
भी बुरा लगने का
स्वांग करना पड़ता है....
मैं अगर तुम्हें कोई मैसेज
इनबॉक्स में छोड़ू
तो तुम्हें सोचना पड़ता है
कि जवाब दूँ या न दूँ
ये सोचकर कि मेरे चरित्र
का ग़लत विश्लेषण न किया जाये....
मैं अगर तुमसे सेक्स की
उन्मुक्त बातें करना चाहूँ या
काम क्रीड़ा में एक दूसरे की देह को
उत्तेजना के शिखर पर ले जाकर
चरमोत्कर्ष की बात करूँ तो
तुम्हें दिखावा करना पड़ता है
कि मुझे पसंद नहीं...
और मैं अश्लील घोषित कर
दिया जाऊँगा!.....
पर सच यही है कि तुम भी
वही करती, देखती या सुनती हो जो
बंद कमरे या अकेले में मैं करता हूँ....
आख़िर क़ुदरत ने भी स्त्री और पुरूष
को एक दूसरे का संम्पूरक बनाया है.....
सृजनात्मक बातें सर्वव्यापी हैं....
समानता भी सार्वभौमिक हो...
नहीं तो आप पर ही दोषारोपण होगा...
क्योंकि तुम ख़ुद को पहले ही
फँसा चुकी हो संकीर्णता के जाल में...
समाज के दकियानूसी सिद्धातों में....
नारी को पहले ख़ुद सशक्त होना पड़ेगा
कि वह चाहती क्या है?
उसे क्या पसंद है?
निकलना पड़ेगा लज्जारूपी
अंधकार से....
तुम्हारी यही लज्जा और कमज़ोरी तो
मर्द को सशक्त और क्रूर बनाती है....
तुम्हें धर्म और मज़हब के दायरे में बाँधने का प्रयास
कि मर्यादा में रहो.....
पर मर्द कभी भी इस दायरे को स्वार्थवश तोड़ सकता है..
या यूँ कहो कि उसके लिए यह दायरे छलावा है.....
तुम्हें समाज का भय कायर बना देता है...
और लज्जा सहनशील....
तुम मर्दो से बहुत मज़बूत हो....
जिस दिन खुलकर बोलने लगोगी
अपने आप सशक्त हो जाओगी.....
और न ही नारी सशक्तीकरण के
लिए स्वार्थी मर्द जाति का मुँह
देखना पड़ेगा... जो स्त्री को देह
ओर भोग से ज़्यादा नहीं मानते........

अजीत यादव



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