चल चलें हम कहीं उम्र भर के लिए
ये ज़मी आसमां है बसर के लिए
इस ज़माने से कुछ भी नहीं चाहिये
मुझको तू चाहिये इस नज़र के लिए
तेरी ज़ुल्फ़ों तले मेरी हर शाम हो
सामने हो तेरा रूख़ सहर के लिए
इक तेरा साथ हो बस ख़ुदा की क़सम
मुझको क्या चाहिये और सफ़र के लिए
अजीत क्या करेंगे रहकर मुर्दों के शहर में
बशर बन गया है दुश्मन बशर के लिए
अजीत यादव
बसर.... निर्वाह करना
रूख़... चेहरा
सहर... सुबह
बशर... आदमी
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