हसीन वादियों को लेकर कोई चला है,
ना जाने कहाँ जाकर बैठा है...
हर एक ख़्वाहिश को मानो वो महज़ एक पर्दा समझता है,
उस नक़ाब के नीचे क्या छुपा है... वो खुदा जाने!
पर हम... हम तो मजबूर होकर आगे हार जाते हैं,
उनकी इस बेरुखी सी ख़्वाहिश के आगे,
ये धुंधला सा मंज़र हम तो नहीं पहचान पाते...
तेरी आशिक की आँखों का!
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