दूर बरगद के पेड़ के झुरमुटों से
चमकता सूरज
पूरब से विस्तार ले रहा है,
गाँव के अन्तिम छोर
का हरा भरा भीटा
अब वीरान है,
चकरोट से सटे
खरिहान का वो महुए का पेड़
अब ठूँठा हो चूका है,
पानी से लबालब भरे गढ़ई में
अब आम नहीं गिरते,
पेड़ो से तोड़े कच्चे आमों के बदले,
अब आइसक्रीम बिका नहीं करती,
गाँव के बीचों बीच बना वो पुराना इनारा
अब सूख चुका है,
आबादी के विस्तार से,
पूराने बागो का ह्रास हो रहा है!
कैसे कहूँ कि,
मेरा गाँव खो रहा है!
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