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मिर्जा गालिब

मैं इनका मुरीद

माशूका की अदाओं और दिलफरेबी से ग़ालिब ने ही बचाए रखा...

कुमार अतुल, अमर उजाला

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27 दिसंबर को  यानी आज तुम्हारी यौम-ए-पैदाइश (जयंती )है । (27 दिसंबर, 1797) को एक अजीम शायर ने जन्म लिया था जिसे हम गालिब के नाम से जानते हैं । मियां, 220 साल बाद भी हमारे जैसे लोग हजारों लोग तुम्हारे फैन हैं और आगे भी रहेंगे। किसी भी अदीब के लिए यह बड़े फख्र की बात है। सच तो यह है कई बातों के लिए मेरे जैसे लोगों पर तुम्हारी उधारी है। यह उधार जिंदगी के हर बढ़ते पाये के साथ दोगुना हुआ जाता है।

अपने मरहूम नाना और दादा जी को गाहे-बगाहे गालिब के -देखने हम भी मगर तमाशा न हुआ,  बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले  जैसे शेरों की गुगली फेंकते हुए सुना था। बचपन की नासमझी की वजह से शेरो के मायने तो नहीं समझ पाए मगर इतना जरूर लगा कि मियां गालिब कोई ऐसी चीज जरूर हैं जिनका जिक्र वह हर मौके पर लाजिमी समझते हैं। आगे पढ़ें

मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का...

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