जो ज़ेहन-ओ-दिल के ज़हरीले बहुत हैं
वही बातों के भी मीठे बहुत हैं
- अख़तर शाहजहाँपुरी
मैं तो ज़हरीले साँपों को अब भी दूध पिलाता हूँ
ये मेरी फ़ितरत है 'अख़्तर' या मेरी नादानी है
- अख़्तर अब्दुर्रशीद
नफ़रतों की नई दीवार उठाते हुए लोग
क्या अजब लोग हैं ज़िंदान बनाते हुए लोग
एहतिमाम सादिक़
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