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मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित प्रसिद्ध खण्डकाव्य: जयद्रथ वध, भाग 1

जयद्रथ-वध का प्रथम सर्ग: मैथिलीशरण गुप्त
                
                                                         
                            जयद्रथ वध का प्रकाशन 1910 में हुआ था। मैथिलीशरण गुप्त की प्रारम्भिक रचनाओं में 'भारत भारती' को छोड़कर 'जयद्रथ वध' की प्रसिद्धि सर्वाधिक रही। कथा का आधार महाभारत ही है। अभिमन्यु की चक्रव्यूह में हत्या के बाद अर्जुन के मन में उपजे रोष के बाद जयद्रथ का वध। कथा को ज्यों का त्यों लेकर भी मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी सरस प्रवाहपूर्ण शैली द्वारा काव्य को नया प्रदान किया है। प्रस्तुत है जयद्रथ-वध का प्रथम सर्ग- 
                                                                 
                            

वाचक ! प्रथम सर्वत्र ही ‘जय जानकी जीवन’ कहो,
फिर पूर्वजों के शील की शिक्षा तरंगों में बहो।
दु:ख, शोक, जब जो आ पड़े, सो धैर्य पूर्वक सब सहो,
होगी सफलता क्यों नहीं कर्त्तव्य पथ पर दृढ़ रहो।।

अधिकार खो कर बैठ रहना, यह महा दुष्कर्म है;
न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना धर्म है।
इस तत्व पर ही कौरवों से पाण्डवों का रण हुआ,
जो भव्य भारतवर्ष के कल्पान्त का कारण हुआ।।

सब लोग हिलमिल कर चलो, पारस्परिक ईर्ष्या तजो,
भारत न दुर्दिन देखता, मचता महाभारत न जो।।
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6 वर्ष पहले

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