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एक लोरी गीत: गर्भस्थ शिशु के लिए...

शिशु
                
                                                         
                            प्रसिद्ध कवियित्री अनामिका मानवीय संवेदनाओं को उकेरने में अग्रणी हैं। महिलाओं और बच्चों की मनोदशा का वास्तविक चित्रण उनकी कई कविताओं में सरल रूप में मिलता है। उन्होंने गर्भस्थ शिशुओं की धड़कन को भी अपने काव्य के जरिए नापा है। उनका यह लोरी गीत आप पढ़ें और जीवन की शुरुआत को महसूस करिए।  
                                                                 
                            

आधा अंधेरा है, आधा उजाला है
इस प्रसन्न बेला में
रह-रहकर उठती है
एक हरी मितली-सी,
रक्त के समंदर से लाना है अमृतकलश!
मेरी इन सांसों से
कांप-कांप उठते हैं जंगल,
दो-दो दिल धड़क रहे हैं मुझमें
चार-चार होंठों से पी रही हूं मैं समंदर!
चूस रही हूं एक मीठी बसंती बयार
चार-चार होंठों से! आगे पढ़ें

एक तरफ मैंने उन्हें!

8 वर्ष पहले

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