आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शिवमंगल सिंह सुमन - वह कवि जिनकी कविता को तत्कालीन प्रधानमंत्री अक्सर सुनाते थे

Hindi poet shivmangal singh suman hindi kavita vardaan mangoonga nahin
                
                                                         
                            अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य #हिंदीहैंहम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। इस कड़ी में आज कुछ बातें व विचार शिवमंगल सिंह सुमन की कविताई पर-  
                                                                 
                            

क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संघर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही

शिवमंगल सिंह सुमन की लिखी इन पंक्तियों को भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अक्सर सुनाया करते थे। यहां तक कि कई लोग मानते रहे कि यह वाजपेयी की लिखी कविता है। शिवमंगल सिंह सुमन की कविताओं में प्रभाव था कि वह आम से लेकर ख़ास तक सभी को स्वयं से जोड़ सकें। हिंदी हैं हम श्रृंखला के अंतर्गत आज हम जानेंगे मूर्धन्य कवि शिवमंगल सिंह सुमन के बारे में।

शिवमंगल सिंह सुमन का जन्म 5 अगस्त 1915 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के झगरपुर में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से बी.ए.और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से एम एऔर पीएचडी की। इसके बाद वे ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में हिंदी के व्याख्याता, माधव महाविद्यालय उज्जैन के प्राचार्य और फिर कुलपति रहे। अध्यापन के अतिरिक्त विभिन्न महत्त्वपूर्ण संस्थाओं और प्रतिष्ठानों से जुड़कर उन्होंने हिंदी साहित्य में वृद्धि की। शिवमंगल सिंह सुमन अध्यापक, कुशल प्रशासक, प्रखर चिंतक और विचारक भी थे।

उनसे संबंधित एक घटना भी है जहां उल्लेख मिलता है कि उन्होंने चंद्रशेखर आज़ाद की मदद की थी और इसके लिए उनके ख़िलाफ़ वारंट भी जारी हुआ था। एक बार उनकी आंखों पर पट्टी बांधकर उन्हें एक अज्ञात स्थान पर ले जाया गया। जब आंख की पट्टी खोली गई तो वह हतप्रभ थे। उनके समक्ष स्वतंत्रता संग्राम के महायोद्धा चंद्रशेखर आज़ाद खड़े थे। आज़ाद ने उनसे प्रश्न किया था, क्या यह रिवाल्वर दिल्ली ले जा सकते हो। सुमन जी ने बेहिचक प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था। 
आगे पढ़ें

6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर