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'मंज़िल' पर चुनिंदा हिंदी शायरी...

'मंजिल' पर चुनिंदा हिंदी शायरी...
                
                                                         
                            हर इंसान को अपनी 'मंजिल' की तलाश है, मंजिल की जूस्तुजू के चलते ही वह अपना जीवन सफर में झोंक देता है। लेकिन कोई मंजिल आखिरी नहीं, मंजिलें जहां ख़त्म होंगी, वहां जीवन थम सा जाता है। और जीवन रुकने का नाम नहीं है, चलने का नाम है। पेश है 'मंजिल' पर शायरों के अल्फ़ाज़- 
                                                                 
                            

जिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र है 
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा 
- बशीर बद्र

रास्ते कहां ख़त्म होते हैं

रास्ते कहां ख़त्म होते हैं ज़िंदग़ी के सफ़र में,
मंज़िल तो वहां है जहां ख्वाहिशें थम जाएं।
-अज्ञात 

अदम की जो हक़ीक़त है वो पूछो अहल-ए-हस्ती से
मुसाफ़िर को तो मंज़िल का पता मंज़िल से मिलता है
- दाग़ देहलवी
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रास्ते कहां ख़त्म होते हैं

7 वर्ष पहले

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