भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 का दिन काला दिवस है। इस दिन देश में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया था। इस दौरान नागरिकों के अधिकार और स्वतंत्रता का घोर हनन किया गया। 21 मार्च 1977 तक यानी 21 महीने की अवधि तक यह जारी रहा। वैचारिक स्वतंत्रता पर कुठाराघात करने वाले इस आपातकाल के दौर को हम विभिन्न कविताओं और शेर-शायरी के जरिए यहां याद कर रहे हैं।
आपातकाल के एक वर्ष पूरे होने पर अटल जी ने यह कविता जेल में लिखी थी...
आपातकाल के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी जेल में बंद थे। आपातकाल के एक वर्ष पूरे होने पर उन्होंने एक कविता लिखी थी।
झुलसाता जेठ मास
शरद चांदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया
सींखचों में सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अम्बर तक
गूंज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया
पथ निहारते नयन
गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आएगा
मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया
हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कुछ उसूलों का नशा था कुछ मुक़द्दस ख़्वाब थे
हर ज़माने में शहादत के यही अस्बाब थे
-हसन नईम
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए: दुष्यंत कुमार
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़
जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले
-मजरूह सुल्तानपुरी
कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है
-कैफ़ी आज़मी
’ठीक है, यदि कुछ नहीं तो विद्रोह ही सही’
— हँसमुख बनिए ने कहा —
’मेरे पास उसका भी बाज़ार है’
मगर आज दुकान बन्द है, कल आना
आज इतवार है। मैं ले लूँगा।
इसे मंच दूँगा और तुम्हारा विद्रोह
मंच पाते ही समारोह बन जाएगा
फिर कोई सिरफिर शौक़ीन विदेशी ग्राहक
आएगा। मैं इसे मुँहमाँगी क़ीमत पर बेचूँगा।
विद्रोह: केदारनाथ सिंह...
आज घर में घुसा
तो वहाँ अजब दृश्य था
सुनिए — मेरे बिस्तर ने कहा —
यह रहा मेरा इस्तीफ़ा
मैं अपने कपास के भीतर
वापस जाना चाहता हूँ
उधर कुर्सी और मेज़ का
एक सँयुक्त मोर्चा था
दोनों तड़पकर बोले —
जी, अब बहुत हो चुका
आपको सहते-सहते
हमें बेतरह याद आ रहे हैं
हमारे पेड़
और उनके भीतर का वह
ज़िन्दा द्रव
जिसकी हत्या कर दी है
आपने
उधर आलमारी में बन्द
क़िताबें चिल्ला रही थीं
खोल दो, हमें खोल दो
हम जाना चाहती हैं अपने
बाँस के जंगल
और मिलना चाहती हैं
अपने बिच्छुओं के डंक
और साँपों के चुम्बन से
पर सबसे अधिक नाराज़ थी
वह शॉल
जिसे अभी कुछ दिन पहले कुल्लू से ख़रीद लाया था
बोली — साहब!
आप तो बड़े साहब निकले
मेरा दुम्बा भेड़ा मुझे कब से
पुकार रहा है
और आप हैं कि अपनी देह
की क़ैद में
लपेटे हुए हैं मुझे
पर उनकी भाषा मेरी समझ से परे थी...
उधर टी० वी० और फ़ोन का
बुरा हाल था
ज़ोर-ज़ोर से कुछ कह रहे थे
वे
पर उनकी भाषा
मेरी समझ से परे थी
कि तभी
नल से टपकता पानी तड़पा —
अब तो हद हो गई साहब!
अगर सुन सकें तो सुन
लीजिए
इन बूँदों की आवाज़ —
कि अब हम
यानी आपके सारे के सारे
क़ैदी
आदमी की जेल से
मुक्त होना चाहते हैं
अब जा कहाँ रहे हैं —
मेरा दरवाज़ा कड़का
जब मैं बाहर निकल रहा था।
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आपातकाल के एक वर्ष पूरे होने पर अटल जी ने यह कविता जेल में लिखी थी...
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