पूरे दिन की दौड़-भाग के बाद जब शाम आती है तो कुछ देर सुस्ताकर ज़िंदग़ी को गहराई से सोचने का मौका मिलता है। शाम की इसी खामोशी को शायरों ने अपने लफ़्ज़ों में कागज़ पर उतारा है, पेश हैं ऐसे ही कुछ चुनिंदा शेर
तेरे आने की उम्मीद और भी तड़पाती है
मेरी खिड़की पे जब शाम उतर आती है
- अज्ञात
तुम ना लगा पाओगे अंदाज़ा मेरी तबाही का
तुमने देखा ही कहां है मुझे शाम होने के बाद
- अज्ञात
अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहां
शाम आ गयी है लौट के घर जाएं हम तो क्या
- मुनीर नियाज़ी
अब तो चुप-चाप शाम आती है
पहले चिड़ियों के शोर होते थे
- मोहम्मद अल्वी
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अब कौन मुंतज़िर है...
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