लोकगीत वह माध्यम है जिसमें समाज स्वयं को अभिव्यक्त करता आ रहा है। लोकसंगीत में उल्लास की अनंत संभावनाएं हैं, जिसके कारण यह हमेशा से लोगों के मन को लुभाता रहा है।लोकगीतों में जैसे विवाह के गीत हैं, खेती के गीत हैं, वैसे ही ऋतुओं के गीत भी हैं, बारहमासा भी है। पेश है बारहमासा से कुछ अंश अवधी में-
असाढ़ मास असाढ़ी जोग
घर-घर मंदिर सजैं सब लोग
चिरई चिरंगुल खोता लगाय
हमरा बलमु परदेस में छाय
मैं न झूलिहौं
भावार्थ:- अषाढ़ के महीने में आषाढ़ का योग है। सब लोग घर-घर में मंदिर सजा रहे हैं। चिड़िया-चिरंगुल भी घोंसले बना रहे हैं, मेरे प्रियतम परदेस में हैं, इसलिए मैं झूला नहीं झूलूंगी।
सावन मास में अधिक सनेह
पिय बिन भूल्यो देह औ गेह
पहिरी है कुसुमी उतारी है चीर
पिया बिन सोहै न मांग सेन्दुर
मैं न झूलिहौं
भावार्थ:- सावन महीना प्रेम का महीना है। प्रियतम के बिना देह और गेह (घर) की सुध बिसर गयी है। कुसुम रंग की चूनर फीकी लगती है। मैंने उतार दी है। प्रिय के बिना मांग का सिंदुर भी शोभा नहीं देता। इसलिए मैं झूला नहीं झूलूंगी।
भादौं मास रात अंधियार
सूझै नाहीं आर और पार
अपनी महल डरै जिया मोर
कन्त बिना कहां पावौं ठौर
मैं न झूलिहौं
भावार्थ:- भादों की महीने की घुप्प अंधेरी रातों में कुछ सूझ नहीं रहा है। अपने महल में ही मुझे डर लग रहा है और प्रियतम के बिना मुझे कहां ठौर ? मैं झूला नहीं झूलूंगी।
कुआर मास सब भरैं बखार
पिय अगुवानी का त्योहार
पहिरौं रंग बिरंगी चीर
पुलकै मोरा सगरो सरीर
अब मैं झूला झूलूंगी
भावार्थ:- क्वार महीने में सारे बखार अनाजों से भर गए हैं, अब प्रियतम के आगमन का त्योहार आ गया है। मैं रंग-बिरंगी चूनर पहन रही हूं। मेरे सारे शरीर में पुलक भर गयी है। अब मैं झूला झूलूंगी।
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7 वर्ष पहले
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