वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
आदत इस की भी आदमी सी है
- गुलज़ार
उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़
हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा
- अमीर क़ज़लबाश
या वो थे ख़फ़ा हम से या हम हैं ख़फ़ा उन से
कल उन का ज़माना था आज अपना ज़माना है
- जिगर मुरादाबादी
काँटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर
फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ
- शकील बदायुनी
कहानी में नए किरदार शामिल हो गए हैं
नहीं मा'लूम अब किस ढब तमाशा ख़त्म होगा
-इफ़्तिख़ार आरिफ़
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