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हर शेर का एक वक़्त होता है...

हर शेर का एक वक़्त होता है...
                
                                                         
                            वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर 
                                                                 
                            
आदत इस की भी आदमी सी है 
- गुलज़ार

उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़ 
हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा 
- अमीर क़ज़लबाश

या वो थे ख़फ़ा हम से या हम हैं ख़फ़ा उन से 
कल उन का ज़माना था आज अपना ज़माना है 
- जिगर मुरादाबादी

काँटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर 
फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ 
- शकील बदायुनी

कहानी में नए किरदार शामिल हो गए हैं 
नहीं मा'लूम अब किस ढब तमाशा ख़त्म होगा 
-इफ़्तिख़ार आरिफ़
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5 वर्ष पहले

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