1-
रात मीठी चांदनी है,
मौन की चादर तनी है,
एक चेहरा ? या कटोरा सोम मेरे हाथ में
दो नयन ? या नखतवाले व्योम मेरे हाथ में?
प्रकृति कोई कामिनी है?
या चमकती नागिनी है?
रूप- सागर कब किसी की चाह में मैले हुए?
ये सुवासित केश मेरी बांह पर फैले हुए:
ज्योति में छाया बनी है,
देह से छाया घनी है,
वासना के ज्वार उठ-उठ चंद्रमा तक खिंच रहे,
ओंठ पाकर ओंठ मदिरा सागरों में सिंच रहे;
सृष्टि तुमसे मांगनी है
क्योंकि यह जीवन ऋणी है,
वह मचलती-सी नजर उन्माद से नहला रही,
वह लिपटती बांह नस-नस आग से सहला रही,
प्यार से छाया सनी है,
गर्भ से छाया धनी है,
दामिनी की कसमसाहट से जलद जैसे चिटकता...
रौंदता हर अंग प्रतिपल फूटकर आवेग बहता ।
एक मुझमें रागिनी है
जो कि तुमसे जागनी है।
2-
वह चित्र भी झूठा नहीं :
तब प्रेम बचपन ही सही
संसार ही जब खेल था,
तब दर्द था सागर नहीं,
लहरों बसा उद्वेल था;
पर रंग वह छूटा नहीं :
उस प्यार में कुंठा न थी
तुम आग जिसमें भर गए,
तुम वह जहाँ कटुता न थी
उस खेल में छल कर गए;
मैं हँस दिया, रूठा नहीं :
उस चोट के अन्दाज़ में
जो मिल गया, अपवाद था,
उस तिलमिलाती जाग में,
जो मिट गया, उन्माद था,
जो रह गया, टूटा नहीं :
अभाव के प्रतिरूप ही
संसृति नया वैभव बनी,
हर दर्द के अनुरूप ही
सागर बना, गागर बनी,
कच्ची तरह फूटा नहीं :
खोकर हृदय उससे अधिक
कुछ आत्मा ने पा लिया,
विक्षोभ को सौन्दर्य कर
संसार पर बिखरा दिया :
दे ही गया, लूटा नहीं ।
3-
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धब्बे और तस्वीर
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