धार के साथ बहे जा रहे थे
नगर के आदमी, जानवर, मकान, झाड़ और
झंखाड़
नदी में आई हुई थी
ऐसी भयंकर बाढ़
एक बड़ी नाव पर बैठकर
कल्केटर साहब
अपने सहयोगी अधिकारियों के साथ
बाढ़ी की तबाही का
मुआयना करने के लिए जा रहे थे
दर्दनाक दृश्यों को देखकर
कोई घबरा न जाए
इसलिए दो-तीन डिप्टी कलेक्टर
निनेमा के गाने गा रहे थे
एक खूबसूरत और जवान लड़की
मंझधार में बहती हुई
मौत से लड़की रही थी
और अधिकारियों की
भूमति हुई नाव
बस उसी तरफ़ बड़ रही थी
लड़की का गोरा रंग
बिजलियां गिराने को बेताब
मतस्य उद्दोग अधिकारी ने
उतार फेंका अपना नकाब
और कहा, "लगता है कोई बड़ी मछली है
इसे बचाने का मन हो रहा है
गौर से देखिए
लहरों में जवानी का कैसा नर्तन हो रहा है
मैं अपना नायलोन का जाल फेकता हूं
बेचारी बच जाएगी"
दूसरे अधिकारियों को पता नहीं था
कि उनकी इस जरा सी बात से
पशुधन अधिकारी को आग लग जाएगी
वे कहने लगे, "मछली साहब को हर जगह
मछली ही दिखाई देती है
और मछली है भी तो आपका क्या लेती है ?
वो तो पानी का जीव है पानी में रहेगा
आपसे जान बचाने के लिए थोड़े ही कहेगा !
बाप रे ! पानी में इतनी तड़पन, इतनी बेचैनी,
इसती घुटना
दिल दया से पिघला जा रहा है
मुझे तो पानी में कोई बड़ा जानवर नज़र आ रहा है
जिले का पशुधन अधिकारी होने के नाते
यह मेरा कर्त्तव्य है कि मैं इसे बचाऊं
इजाजत हो पानी में कूद जाऊं"
(सुरेश उपाध्याय की हास्य कविता 'बाढ़ की तबाही का मुआयना' के ये चुनिंद अंश हैं, जो 'यार सप्तक' नाम की किताब से लिए गए हैं। यह किताब डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुई है।)
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