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क़तील शिफ़ाई: हालात के क़दमों पे क़लंदर नहीं गिरता

qateel shifai famous ghazal halat ke qadmon pe qalandar nahin girta
                
                                                         
                            

हालात के क़दमों पे क़लंदर नहीं गिरता
टूटे भी जो तारा तो ज़मीं पर नहीं गिरता

गिरते हैं समुंदर में बड़े शौक़ से दरिया
लेकिन किसी दरिया में समुंदर नहीं गिरता

समझो वहाँ फलदार शजर कोई नहीं है
वो सहन कि जिस में कोई पत्थर नहीं गिरता

इतना तो हुआ फ़ाएदा बारिश की कमी का
इस शहर में अब कोई फिसल कर नहीं गिरता

इनआ'म के लालच में लिखे मद्ह किसी की
इतना तो कभी कोई सुख़न-वर नहीं गिरता

हैराँ है कई रोज़ से ठहरा हुआ पानी
तालाब में अब क्यूँ कोई कंकर नहीं गिरता

उस बंदा-ए-ख़ुद्दार पे नबियों का है साया
जो भूक में भी लुक़्मा-ए-तर पर नहीं गिरता

करना है जो सर मा'रका-ए-ज़ीस्त तो सुन ले
बे-बाज़ू-ए-हैदर दर-ए-ख़ैबर नहीं गिरता

क़ाएम है 'क़तील' अब ये मिरे सर के सुतूँ पर
भौंचाल भी आए तो मिरा घर नहीं गिरता
 

4 घंटे पहले

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