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तहजीब को बयां करती मजाज़ लखनवी की नज़्म: ये मेरा चमन है, मैं अपने चमन का बुलबुल हूँ

गंगा-जमुना तहजीब को बयां करती मजाज़ लखनवी की नज़्म: ये मेरा चमन है, मैं अपने चमन का बुलबुल हूँ
                
                                                         
                            सर शार-ए-निगाह-ऐ-नरिगस हूँ, पाबस्ता-ए-गेसू-ऐ सुंबुल हूँ।
                                                                 
                            
ये मेरा चमन है मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल हूँ।

हर आन यहाँ सहबा-ए-कुहन, इक सागर-ए-नौ में ढलती है।
कलियों से हुस्न टपकता है, फूलों से जवानी उबलती है।

जो ताक़-ए-हरम में रौशन है, वो शमआ यहाँ भी जलती है।
इस दत के गोशे-गोशे से, इक जू-ऐ-हयात उबलती है।
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6 वर्ष पहले

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