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बांसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है - कुमार विश्वास

kumar vishwas hindi kavita bansuri chali aao honth ka nimantran hai
                
                                                         
                            

तुम अगर नहीं आई गीत गा न पाऊंगा
सांस साथ छोडेगी, सुर सजा न पाऊंगा
तान भावना की है शब्द-शब्द दर्पण है
बांसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है

तुम बिना हथेली की हर लकीर प्यासी है
तीर पार कान्हा से दूर राधिका-सी है
रात की उदासी को याद संग खेला है
कुछ गलत ना कर बैठें मन बहुत अकेला है
औषधि चली आओ चोट का निमंत्रण है
बांसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है

तुम अलग हुई मुझसे सांस की ख़ताओं से
भूख की दलीलों से वक्त की सज़ाओं से
दूरियों को मालूम है दर्द कैसे सहना है
आंख लाख चाहे पर होंठ से न कहना है
कंचना कसौटी को खोट का निमंत्रण है
बांसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है

6 वर्ष पहले

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