इस महानगर से रोज़ गायब होते बच्चे
कितना दुख और नाउम्मीदी छोड़ जाते हैं अपने पीछे
जिसे जानते हैं सिर्फ उनके मां-बाप
और परिवार के लोग।
हमारे इस समय के लिए
महज़ एक सूचना, संख्या और
ख़बर से बढ़कर कुछ नहीं है
और ख़बर तो बेख़बर बनकर रह जाती है,
फिर
इसका क्या करें कि
ग़ायब होने वाले बच्चों में ज्यादातर लड़कियां होती हैं,
पर बच्चे तो आख़िर बच्चे ही होते हैं
चाहे वे लड़के हों या लड़की।
अदालतें, मानवाधिकार एवं तमाम दूसरे संगठन
इनके बारे में
यही तो कहते हैं कि
गुम बच्चों में ज्यादातर
मानव तस्करों के शिकार हो जाते हैं।
पर कौन जाने, क्या होता है, उनका, पर
यही तो कहती हैं ये संस्थाएं कि
उन बच्चे-बच्चियों में से ज्यादातर
यौन शोषण
भीख मंगवाने और
मानव अंगों का कारोबार करने वाले गिरोहों के हत्थे चढ़ जाते हैं।
जिंदगी उनकी
एक ग़ुमनाम त्रासदी बनकर रह जाती है
ऐसी त्रासदियां हमारे जीवन और व्यवस्था में आंधी और
तूफ़ान बनकर कभी आती ही नहीं
इसलिए
इससे अप्रभावित हम
उसी तरह अपने दैनंदिन के कार्यों में रमे रहता है
जिस तरह उन बच्चों की
गुमशुदगी की प्राथमिकी भी दर्ज़ न करने वाली पुलिस
लापता बच्चों की बाबत
रिपोर्ट जारी करने वाला राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और
इसके बाबत
अदालतों से डांट-फटकार खाने वाली सरकारें!
जब 'तारे ज़मीन पर' फिल्म को देख
अपनी नम हुई आंखों को पोंछ रहे हैं हम
तब भी हमारे आंसुओं में
वे बच्चे शामिल नहीं होते
नहीं आते याद वे बच्चे और
हम भी
यदि इसे संवेदनशीलता से नहीं लेते
तो इसलिए कि -
वे बेहद गरीब मां-बाप के बच्चे होते हैं
'तारे ज़मीन पर' के खाते-पीते घरों के बच्चे नहीं ।
- दुर्गा प्रसाद गुप्त
साभार : नया ज्ञानोदय (अंक-135, मई 2014)
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