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मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना, ग़ैरों को गले न लगा सकूं

अटल बिहारी वाजपेयी
                
                                                         
                            अपने राजनीतिक जीवन में बेलाग भाषण और वाकचातुर्य के साथ मनभावन कविताओं से लोगों के दिलों में सम्मानीय स्थान हासिल करने वाले अटल की कविताओं में जीवन का संघर्ष साफ झलकता है। उनकी चुनिंदा कविताएं यहां आप पढ़ सकते हैं।
                                                                 
                            

ऊँचे पहाड़ पर, 
पेड़ नहीं लगते, 
पौधे नहीं उगते, 
न घास ही जमती है। 

जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।

ऐसी ऊँचाई, 
जिसका परस 
पानी को पत्थर कर दे, 
ऐसी ऊँचाई 
जिसका दरस हीन भाव भर दे, 
अभिनंदन की अधिकारी है, 
आरोहियों के लिये आमंत्रण है, 
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं, 

केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती

किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि 
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती, 
सबसे अलग-थलग, 
परिवेश से पृथक, 
अपनों से कटा-बँटा, 
शून्य में अकेला खड़ा होना, 
पहाड़ की महानता नहीं, 
मजबूरी है। 
ऊँचाई और गहराई में 
आकाश-पाताल की दूरी है।
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केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती

8 वर्ष पहले

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