लंबे समय बाद साहित्य जगत में कुछ सार्वजनिक हलचल दिल्ली के साहित्य अकादमी में तब नज़र आई, जब इस साल का देवीशंकर अवस्थी सम्मान युवा आलोचक अच्युतानंद मिश्र को दिया गया। जाने माने और वयोवृद्ध आलोचक प्रो विश्वनाथ त्रिपाठी, कवि- आलोचक अशोक वाजपेयी और मशहूर लेखिका मृदुला गर्ग समेत साहित्य जगत की तमाम हस्तियों की मौजूदगी में मौजूदा समय के बदलते हुए मायनों और संदर्भों पर चर्चा हुई। इस मौके पर देवीशंकर अवस्थी पर कवि-फिल्मकार देवीप्रसाद मिश्र की एक फिल्म भी दिखाई गई।
साहित्य अकादमी के अब तक काफी हद तक स्वायत्त बने रहने की झलक भी इस कार्यक्रम से मिली क्योंकि इसके सभागार में हुए इस कार्यक्रम में तमाम प्रगतिशील और मौजूदा सत्ता के खिलाफ रचनात्मक मोर्चा खोलने की हिम्मत रखने वाले साहित्यकार शामिल हुए। मौजूदा माहौल और सत्ता की तानाशाह, जनविरोधी और संवेदनहीन चरित्र को अपने अपने तरीके से वक्ताओं ने सामने रखने की कोशिश की।
अपनी आलोचना पुस्तक ‘कोलाहल में कविता की आवाज़’ के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान से नवाजे गए प्रखर आलोचक अच्युतानंद मिश्र ने अपने वक्तव्य में आज के बदलते समय के सच को सामने लाने की कोशिश की। उन्होंने आलोचना की समृद्ध परंपरा का जिक्र करते हुए देवीशंकर अवस्थी, विजयदेव नारायण शाही, मलयज, नामवर सिंह और सुरेंद्र चौधरी को याद किया। साथ ही अस्सी के दशक तक आते आते इस परंपरा को खंडित होने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भाषा को लेकर नई चुनौतियां आईं, क्रांति शब्द का अर्थ बदल गया। उन्होंने समय के बोध का जिक्र किया और साथ ही नैतिकता के बदलते मानदंड की व्याख्या करने की कोशिश की।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. विश्वनाथ त्रिपाठी ने आज की उपभोक्तावादी संस्कृति का जिक्र करते हुए कहा कि साहित्य और संस्कृति में भी यह हावी है। उन्होंने छोटे-छोटे संस्थानों की ज़रूरत और अहमियत को बताते हुए कहा कि आज के अंधेरे समय में अलग-अलग शहरों में बने इन छोटे छोटे संस्थानों औऱ प्रतिष्ठानों ने उम्मीद की रोशनी जगा कर रखी है। देवीशंकर अवस्थी सम्मान के ज़रिये जिस तरह इस परिवार और संस्थान ने साहित्य की जनपक्षधरता को बरकरार रखा है, उसे बरसों बरस तक चलाए रखने की जरूरत है और इसके लिए व्यवस्थापकों, आयोजकों के साथ सक्षम लोगों को आगे आने की जरूरत है। विश्वनाथ जी ने अपने संक्षिप्त लेकिन किस्सागोई अंदाज़ में आज के संदर्भ में लेनिन का भी जिक्र किया और कहा कि ऐसे छोटे संस्थान ही आज बड़ा और एतिहासिक काम कर रहे हैं। इतिहास में रास्ता दिखाने का काम तो बड़े लोग करते हैं लेकिन इतिहास को झेलकर इसे आगे बढ़ाने का काम मामूली आदमी करते हैं। इसीलिए लेनिन ने कहा कि मिडिल क्लास तो लीड ही करता है, काम तो वर्किंग क्लास ही करता है।
जानी-मानी लेखिका मृदुला गर्ग ने मौजूदा संदर्भ, कोरोना काल के दौरान बदली हुई परिस्थितियों और चिंतन का जिक्र करते हुए कहा कि हमारे भीतर एक विकृत मानसिकता पैदा कर दी गई है, ये अच्छा है, ये बुरा है, लोग आपस में बंटे हुए हैं। आपको तय करने का अधिकार नहीं है कि आप कौन हैं। सत्ता तय करेगी कि आप कौन हैं, क्या हैं और आपको क्या चाहिए और आपका भविष्य कैसा होना चाहिए। पूरी मानवीयता सभ्यता और प्रकृति के बीच एक युद्ध चल रहा है। कोरोना ने इसकी एक तस्वीर हमें दिखलाई। और यही युद्ध देश के भीतर सत्ता और हमारे बीच चल रही है। हम बार-बार हथियार डाल देते हैं। क्रांति शब्द से हम घबराने लगे हैं।
क्रांति सिर्फ सूचना क्रांति तक सिमट गई है। जो बेबुनियाद सूचना एक क्रांति बनकर आपके सामने एक दिलकश, दिलफरेब अंदाज में दिखलाई जाती है, ये बताया जाता है कि हमने क्रांति कर ली, जो पुराना खूबसूरत था, उसे तोड़कर हमने अपने हिसाब से कुछ नया बनाया है। आज आम आदमी का कोई मतलब नहीं रह गया है। आज आम लोगों को, किसानों को कर्ज लेने के लिए मजबूर किया जाता है। सत्ता ने ये प्रपंच रच रखा है और उसी सत्ता को हम बार बार चुनते हैं। यही आज का सच है और यही आज के रचनाकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी ने कहा कि आज वह समय है जब आलोचना करने को अपराधी घोषित किया जा रहा है, अभी वो राजनीति के क्षेत्र में है, कम से कम साहित्य में अभी तक नहीं आया है, लेकिन देर-सबेर यहां भी आ सकता है। आज की सत्ता जब सवाल पूछने, आलोचना करने को आज की सत्ता वर्जित करती है और इसके विरुद्ध हमारे बुद्धिजीवी कुछ नहीं कहते। ऐसे समय में लेखक को अपने उपर संदेह करना चाहिए। ये समय बहुत गहरे संकट का है और इसमें साहित्य और आलोचना को बचाए रखना बहुत जरूरी है।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए जाने माने पत्रकार और समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी ने अच्युतानंद मिश्र के कामकाज पर रोशनी डाली और कहा कि लंबे समय के बाद ऐसे आयोजन ने साहित्य जगत में एक नई ऊर्जा का संकेत दिया है। अच्युतानंद मिश्र की आलोचना पुस्तक 'बाजार के अरण्य में' भी काफी चर्चित रही है। उनका नया कविता संग्रह 'चिड़िया की आंख भर रोशनी में' जल्दी ही आने वाली है।
4 वर्ष पहले
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