कल रजा फ़ाउंडेशन द्वारा इंडिया इंटरनेशल सेंटर में 2021 के भारत भूषण अग्रवाल युवा कविता सम्मान के संयोजक कवि, आलोचक और ‘समालोचन’ के संपादक अरुण देव द्वारा घोषणा की गयी ...इस वर्ष का सम्मान युवा कवि सुधांशु फ़िरदौस को उनके सद्यः प्रकाशित कविता संग्रह पर प्रदान किया जाएगा ! इसमें सम्मान स्वरूप 21 हजार रुपये और प्रशस्ति-पत्र दिया जाएगा।
भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी कविता में पिछले चार दशकों से दिया जाने वाला सबसे प्रतिष्ठित और चर्चित सम्मान रहा है। इसे कवि भारतभूषण अग्रवाल के सम्मान में प्रतिवर्ष किसी युवा कवि की उसी वर्ष प्रकाशित उसकी किसी एक कविता पर दिया जाता रहा है।
इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली के रज़ा के युवा समारोह में- डॉ.अरुण देव ने 2021 के लिए 36 वर्षीय सुधांशु फ़िरदौस के राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित पहले कविता संग्रह- ‘‘अधूरे स्वाँगों के दरमियान’ को’ देने का अभिमत देते हुए कहा है कि- “सुधांशु फ़िरदौस की कविता में भाषा की शाइस्तगी और जनपदीय शब्दों का कुशल रचाव है, वे दृश्य के कवि हैं। इस संग्रह से हिंदी कविता में प्रकृति और जनपदीय जीवन की वापसी हुई है। उनकी कविता कालिदास और मीर दोनों से प्रभावित है और दोनों धाराओं का उनमें सौष्ठव और विकास दिखता है।”
इस अवसर पर अरुण देव द्वारा सुधांशु फ़िरदौस पर दिया गया वक्तव्य इस प्रकार है-
2021 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित सुधांशु फ़िरदौस (जन्म: 2 जनवरी, 1985, मुजफ्फरपुर- बिहार) के पहले कविता संग्रह ‘अधूरे स्वाँगों के दरमियान’ को मैं 2021 के भारत भूषण सम्मान के लिए प्रस्तावित करता हूँ।
किसी युवा के पहले कविता संग्रह का प्रकाशन जहाँ ख़ुद उसके लिए ख़ास अनुभव होता है वहीं कविता की दुनिया में उसका वह पता बनता है, कवि के रूप में उसके फलने-फूलने की जड़ें यहीं दबी-ढंकी रहती हैं।
विस्मित करते हुए सुधांशु फ़िरदौस अपने पहले संग्रह से ही भाषा की शाइस्तगी और जनपदीय शब्दों के रचाव में कविता को संभव करने की शिल्पगत कुशलता के साथ सामने आते हैं। देशज जीवन की धूसर मिट्टी में उनका कवि प्रकृति की समृद्धि को देखता है, जीवन को देखता है, रोज-रोज की चर्या को देखता है। इस बसेरे में नाना जीव-जन्तु, वनस्पतियां, नदी, ऋतुएं और रंग बिखरे हुए हैं। अधिकतर कविताएं अपने अभीष्ट को देखते हुए उमगती हैं। सुधांशु दृश्य के कवि हैं। कहीं पीपल पर जुगनुओं द्वारा बुन दी गयी चादर है तो किसी कविता में अभी-अभी डूबे सूरज की लालिमा बादलों में उलझी रह जाती है।
शायद ही कोई कवि हो जिसने प्रेम के रंगों से अपनी कविता न रंगी हो। सुधांशु भी रंगते हैं। कहीं चटख पर अक्सर उदास। टूटना और बिखरना और यह सोचना कि ‘जब सारे तारे चले जाएंगे और न जाते-जाते रात भी चली जाएगी तो चाँद क्या करेगा’। प्रेम में भी वह संयत हैं। वाचालता वैसे भी सच्चे प्रेमी को सांत्वना नहीं देती न ही शोभा।
कवि अपने पूर्वजों को पहचानता है, इस प्रगाढ़ता ने ही सुधांशु को संयमित किया है। मीर और कालिदास तो सीधे-सीधे आते हैं- कुमारसम्भवम्, ऋतुसंहारम्, और मेघदूत से कविताएँ नि:सृत हुई हैं। हिंदी कविता अपनी समृद्ध अनेकता के साथ यहाँ उपस्थित है- ‘खिली है शरद की स्वर्ण-सी धूप’ जैसी लम्बी कविताएँ ख़ासकर- ‘कालिदास का अपूर्ण कथागीत’, और ‘मेघदूत विषाद’ अपनी सघनता और भारतीय काव्य-परम्परा के अक्षय औदात्त के रूप में देर तक टिकने वाली कविताएं हैं।
कवि, कविता को ओझल नहीं होने देता, वैचारिक और राजनीतिक मंतव्य की कविताओं में भी। उसका मानना है कि- ‘कला-क्षेत्र में अधैर्य पाप नहीं महापातक है।” यह वह बात है जो कवि को अलग करती है और उसके कवि-भविष्य के प्रति विश्वास पैदा करती है। सजग-सचेत कवि की तरह सुधांशु वक्त को भी देखते चलते हैं-
‘वह पहले चूहा था
फिर बिलार हुआ
फिर देखते-देखते शेर बन बैठा
शहद चाटते-चाटते
वह खून चाटने लगा है
अरे भाई जागो,
तुम्हारे ही वरदान से
यह हुआ है’
इस कविता का शीर्षक है- तानाशाह।
मैं सुधांशु सुधांशु फ़िरदौस के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ और भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार समिति तथा रज़ा फाउंडेशन के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ।
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4 वर्ष पहले
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