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अमर उजाला कवि सम्मेलन में देर रात तक कविताओं और शायरी पर झूमते रहे श्रोता

अमर उजाला कवि सम्मेलन
                
                                                         
                            अमर उजाला की ओर से पंचायत भवन सभागार में आयोजित कवि सम्मेलन में देर रात तक कवियों और शायरों ने अपने कलाम से श्रोताओं को बांधे रखा।
                                                                 
                            

जहां प्यार, मोहब्बत की बात हुई वहीं हंसी की फव्वारे भी फूटे, देश भक्ति की भी बात हुई। 

कवि सम्मेलन का आग़ाज़ मुरादाबाद के शायर कृष्ण कुमार नाज़ ने किया। उन्होंने पढ़ा - 

झूठ है, छल है, कपट है, जंग है, तकरार है, 
सोचता रहता हूं अक्सर क्या यही संसार है। 

फैज़ाबाद से आए कवि जमुना प्रसाद उपाध्याय ने अपनी रचना सुनाई - 

जब-जब रायशुमारी करनी पड़ती है, 
क्या-क्या कारगुज़ारी करनी पड़ती है, 
खादी से समझौता करना पड़ता है, 
गांधी से मक्कारी करनी पड़ती है। 

ग्वालियर से आए मदन मोहन मिश्रा दानिश ने पढ़ा - 

और क्या आख़िर तुझे ऐ ज़िंदगानी चाहिए, 
आरजू कल आग की थी आज पानी चाहिए, 
ये कहां की रीत है, जागे कोई सोए कोई, 
रात सबकी है तो सबको नींद आनी चाहिए। 

लखनऊ से आईं प्रसिद्ध कवयित्री डॉ. सरिता शर्मा ने अपनी कविता सुनाई - 

निस्वार्थ समर्पण को कमज़ोरी मत समझो, 
मन के रिश्ते को कच्ची डोरी मत समझो, 
तुम पढ़ न सके यह कमी तुम्हारी अपनी है, 
मेरे मन की किताब को कोरी मत समझो। 

देवबंद से आए मशहूर शायर नवाज़ देवबंदी ने अपना कलाम पेश किया - 

रोशनी का कुछ न कुछ इमकान होना चाहिए, 
बंद कमरे में भी रोशनदान होना चाहिए, 
हिंदू, मुस्लिम चाहे जो लिक्खा हो माथे पर मगर, 
आप के सीने पर हिंदुस्तान होना चाहिए। 

हरियाणा से आए हास्य कवि अरुण जेमिनी ने अपनी रचना पेश की - 

चुनाव परिणाम वाले दिन 
अखिलेश ने राहुल को फोन किया - 
लगता है हम बुरी तरह हार रहे हैं, ये तो हद है 
राहुल बोला - तेरी तू जाने हमें तो आदत है। 

मशहूर शायर राहत इंदौरी ने शायरी सुनाई - 

कई दिन से नहीं डूबा ये सूरज, 
हथेली पर मेरी छाला पड़ा है, 
ये साज़िश धूप की या हवा की, 
गुलों का रंग क्यों काला पड़ा है। 

कार्यक्रम की निज़ामत कर रहे मशहूर नाज़िम मंसूर उस्मानी ने पढ़ा - 

पहले तो उसकी याद ने सोने नहीं दिया, 
फिर उसकी आहटों ने कहा जागते रहो। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे यश भारती सम्मानित प्रसिद्ध नवगीतकार माहेश्वर तिवारी ने पढ़ा - 

डबडबाई है नदी की आंख, 
बादल आ गए हैं, 
सुबह से ही मन हुआ नाता, 
अंधेरा पाख बादल आ गए हैं। 

कार्यक्रम में माहेश्वर तिवारी को उनकी साहित्यिक यात्रा के लिए अमर उजाला की ओर से शॉल और स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम में आकाश ग्रुप, हरसहायमल श्यामलाल ज्वैलर्स, स्कॉलर डेन, ग्रीन ऑर्चेड, आशियाना सिटी, ड्राइव इन-24, न्यूरोन हॉस्पिटल, डायल एमबीडी ने सहयोग किया। 
9 वर्ष पहले

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