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डेजर्शन : प्रेम की त्रासदी

desertion : prem ki trasadi
                
                                                         
                            साहित्यिक हलके में आजकल अब्दुलरज़ाक गुरनाह का नाम गूँज रहा है। कारण उन्हें इस वर्ष का साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ है। 1948  में जन्में गुरनाह तीन दशकों से लिख रहे हैं। हिन्दमहासागर के जिनज़ीबार के इस लेखक के दस उपन्यास प्रकाशित हैं। हालाँकि बीस साल की उम्र में वे अपना जन्मस्थान छोड़ कर इंग्लैंड पयायन कर गए थे मगर अपने देश से भावात्मक संबंध अब तक बना हुआ है। 17 साल वे चाह कर भी अपने देश न लौट सके अब अक्सर जाते हैं। स्वयं को मात्र लेखक मानने वाले अब्दुलरज़ाक शिक्षा के लिए साहित्य की कोटि बनाने के पक्ष में हैं, अन्यथा पोस्टकोलोनियल, प्रवासी या किसी अन्य नाम से साहित्य का बँटवारा वे स्वीकार नहीं करते हैं। केंटबरी के केंट कॉलेज से रिटायर्ड हुए गुरनाह का 2005 में प्रकाशित उपन्यास ‘डेजर्शन’ उनके लेखन की विशेषताओं से लैस है।
                                                                 
                            
कॉमनवेल्थ प्राइज़ के लिए नामांकित ‘डेजरर्शन’ में अलगाव है, पलायन है, मरणशील गैरनस्लीय अवैध प्रेम है, संस्कृतियों का मिलन है। परिवार हैं और परिवार की अपेक्षाएँ तथा उसके भयंकर दबाव हैं। तीन भागों में विभाजित उपन्यास 1899 में प्रारंभ होता है और इसकी परिणति बीसवीं सदी के मध्य में होती है। इस समय तक तंज़ानिया विदेशी शासन से मुक्त हो चुका है। भारतीय मूल के पिता का बेटा हसनअली मोम्बासा में पंसारी है। दुकान से सटे घर में पत्नी मलिका, बहन रेहाना उसके साथ रहती हैं। एक दिन भूखा-प्यासा, घायल एक इंग्लिशमैन मार्टिन पीयर्स हसनअली को सुबह-सुबह मस्जिद जाते हुए पड़ा मिलता है। दयालु हसनअली कुछ लोगों की सहायता से उसे उठा कर अपने घर ले आता है, जहाँ खूबसूरत रेहाना उसकी सेवा करती है। मगर जल्द ही खबर मिलते अंग्रेज अधिकारी इन लोगों को डरा-धमका कर उसे अपने यहाँ ले जाता है। चंगा होने पर वह माफ़ी माँगने और कृतज्ञता जताने हसनअली के घर आता है और रेहाना के प्रेम में पड़ जाता है। अविश्वसनीय होते हुए भी ऐसे प्रेम की परिणति ज्ञात है, पर ‘कैसे और क्या हुआ’ बता कर मैं आपका मजा किरकिरा नहीं करना चाहती हूँ। तीन पीढ़ियों को समेटती कहानी एक बार शुरु करने पर आप समाप्त किए बिना छोड़ नहीं सकते हैं। समाप्त होने के बाद भी यह आपके साथ रहती है।
उपन्यास रशीद और अमीन दो भाइयों और बहन फ़रीदा की कहानी भी कहता है। असल में काफ़ी हिस्सा अमीन की दृष्टि से है। अमीन पढ़ने के लिए इंग्लैंड जाता है और वहीं का हो कर रह जाता है। बड़े भाई रशीद से परिवार बहुत अपेक्षाएँ करता है और वह उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरता है। रशीद परिवार के दबाव में आकर, माता-पिता की अपेक्षाओं को पूरा करते हुए खुद एक तरह की आत्महत्या करता है। अपनी माँ को वचन देता है कि वह उम्रदराज जमीला से कभी नहीं मिलेगा और वह इस प्रण का पालन करता है। दुनिया बहुत छोटी और गोल है। उपन्यास रेहाना एवं जमीला के तार जोड़ता है। कई साल बाद अमीन भाई के दर्द को अनुभव करता है क्योंकि उसे भी चोट पहुँची है। उसने जिस इंग्लिश औरत से प्यार और शादी की थी वह उसे छोड़ कर चली गई है। उसे फ़िर से प्यार हुआ है। उसे किससे प्यार हुआ है? क्यों वह वापस लौट कर भाई से मिलना चाहता है? पढ़ कर इसे अनुभव करना होगा।

रेहाना को लोग नाजायज संतान मानते हैं क्योंकि उसका पिता भारत से था जबकि माँ अफ़्रीकी थी। और उसने एक इंग्लिशमैन से प्यार किया है। बचपन में वह अपने लिए सोहिली शब्द ‘चोटरा’ सुनती थी मगर उसका अर्थ नहीं समझती थी। हाँ, जानती थी कि खराब शब्द है, बाद में उसे पता चला कि यह ‘हरामी’ के लिए प्रयुक्त होता है।
सोहिली मातृभाषा होने के बावजूद गुरनाह ने इंग्लिश में लिखना पसंद किया। उनके उपन्यासों में सोहिली, अरबी, हिन्दी, गुजराती के शब्द मिलते हैं। उदासी से भरपूर यह उपन्यास ‘डेजर्शन’ एकाध छींटा हास्य का भी बिखेरता है जैसे हड्डी जोड़ने वाले याहया की कहानी जिसे पीठ पीछे ‘लेगब्रेकर’ पुकारा जाता है। ऑन्ट (मौसी) मरियम चार पति चाहती है ताकि एक से मन भर जाए तो दूसरे को बुला सके। जब गुजराती की बात आई तो बताती चलूँ गुजराती में माँ को ‘बा’ कहते हैं। गुरनाह के उपन्यासों में माँ तो माँ रहती है मगर पिता ‘बा’ पुकारा जाता है। रेहाना का पति आज़ाद कालीकट से है जिसका वह एक लंबे समय से इंतजार कर रही थी।
अब्दुलरज़ाक गुरनाह कहते हैं कि वे इन बातों के टुकड़ों को लिखते हैं ताकि खुद को कह सकें कि वे जीवित हैं। यह नहीं भूलने का एक तरीका है। वे पूछते हैं कि सर्वोत्तम लोग कैसे निर्दयी भी हो सकते हैं? पाठक अमीन की माँ की क्रूरता भूल नहीं सकता है। पाठक तहे दिल से चाहता है अमीन अपना प्रण तोड़ दे और परिष्कृत जमीला के पास लौट जाए।
इस उपन्यास में पात्र डायरी रखते हैं। रशीद-अमीन की बहन फ़रीदा जिसे सब बेवकूफ़ मानते थे उसका काव्य संकलन प्रकाशित होता है। उपन्यास पत्र में भी कहानी को आगे बढ़ाता है। पात्र साहित्य में रूचि लेते हैं और मौके-बेमौके साहित्य खासकर कविता से कोट भी करते हैं। यहाँ आए ‘जल्दी-जल्दी’, ‘दुका’ (दुकान), ‘शरबत’, ‘आना’, ‘रुपी’, ‘मिहराब’, ‘रमदान’, ‘समोसा’, जुमा जैसे शब्द भारतीय पाठकों को बहुत अपनेपन का बोध कराते हैं। हसनअली का आतिथ्य सत्कार मन को छूता है। स्कूल में बच्चों का पहाड़ा याद करना भी मेरी पीढ़ी के पाठकों को बहुत अपना लगता है। उपन्यास जंज़ीबार में बोहरा गुजराती, गोअन, पुर्तगाली, अरब, ओमानी, ब्रिटिश, सोमाली आदि विभिन्न समुदायों का समागम देखता है।
दो वर्जित त्रासद प्रेम और उनका प्रेमियों के परिवार पर असर को दिखाता उपन्यास साहित्य की शक्ति का बेजोड़ उदाहरण है। पीढ़ियाँ इन प्रेम से प्रभावित होती हैं। कथावाचक कहानी सुना रहा है, वह कहानी में खुद उपस्थित है मगर यह उसकी कहानी नहीं है। यह हम सबकी कहानी है। अब्दुलरज़ाक गुरनाह मनुष्य की कहानी लिख रहे हैं। यह कहानी के भीतर कहानियों की कहानी लिख रहे हैं।
गंभीरता से रचे गए गुरनाह के सातवें उपन्यास में परित्याग (डेर्जर्शन) कई रूपों में आता है। इसका पहला भाग उपनिवेश काल में पूर्वी अफ़्रीका को उपनिवेशियों की नजर से दिखाता है। वे यहाँ के लोगों में सभ्यता लाना चाहते हैं। मगर उपन्यास उनके तथाकथित उच्च विचारों पर अधिक देर टिकता नहीं है। दूसरा भाग रशीद, अमीन, फ़रीदा, जमीला की कहानी कहता है। तीसरा भाग इन कहानियों को जोड़ कर मुकम्मल बनाता है।
उपन्यास एक बहुत मानीखेज प्रश्न पूछता है, यहाँ उससे ऐसा क्या बेहतर था जिसे वह पीछे छोड़ कर आया था?

लेखिका नोबल पुरस्कार संबंधित साहित्य के मूल्यांकन और अनुवाद के उल्लेखनीय कार्य हेतु जानी जाती हैं।
4 वर्ष पहले

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