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ए सोल्जर डायरी: कारगिल द इनसाइड स्टोरी

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दिवंगत कवि सुदीप बनर्जी की एक कविता की पंक्ति है, 'जख्मों के कई नाम, उनमें एक लंदन'। वरिष्ठ पत्रकार हरिंदर बवेजा की कारगिल युद्ध पर दो दशक पहले आई किताब 'ए सोल्जर्स डायरी: कारगिल इनसाइड स्टोरी' को पढ़ते हुए कविता की यह पंक्तियां सहसा याद आ गईं, अन्यथा इसका कारगिल युद्ध से कोई संबंध नहीं है। कारगिल युद्ध को कवर करने वाले अनेक पत्रकारों ने उस दौर की वीरगाथा पर केंद्रित कई किताबें लिखी थीं, जो चर्चित भी रहीं। मगर बवेजा की यह किताब उन सबसे इस मायने में अलग थी कि इसके जरिये उन्होंने ऐसे अनछुए पहलुओं को सामने लाया था, जिनके बारे में शायद कभी पता ही नहीं चलता। हो सकता है कि उस युद्ध से संबंधित बहुत-सी आंतरिक रिपोर्ट्स आज भी किसी कोने में धूल खा रही हों। करीब दो दशक बाद इस किताब का नया संस्करण आया है, जिसे पढ़ना उस खतरनाक मंजर से गुजरने जैसा है, जिसमें हमारे सैनिकों को बेहद मुश्किल और दुष्कर लड़ाई लड़नी पड़ी थी।
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8 वर्ष पहले

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