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320 साल पुराने दक्षिण मां काली मंदिर में ताला चढ़ाने से पूरी होती मन्नत, सप्तमी पर उमड़ते हैं श्रद्धालु

शिवाला में बंगाली मोहाल स्थित दक्षिण मां काली मंदिर करीब 320 वर्षों से श्रद्धा और भक्ति का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि वर्ष 1706 में स्थापित इस मंदिर के स्थान पर कभी घना जंगल हुआ करता था। उस समय गंगा की धारा शिवाला गेट के समीप बहती थी और साधक एकांत में मां की आराधना करते थे। मंदिर को काली बाड़ी के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार मां काली ने अपने अनन्य भक्त फनी भूषण को स्वप्न में दर्शन देकर सेवा के लिए बुलाया था। इसके बाद वह एक लोटा और अंगोछा लेकर कोलकाता से पैदल यात्रा करते हुए गंगा किनारे पहुंचे। जंगल के बीच एक छोटी झोपड़ी में मां की प्रतिमा विराजमान थी। वहां पूजा कर रहे साधक ने उन्हें मंदिर की सेवा का दायित्व सौंपा और अंतर्ध्यान हो गए। इसके बाद प्रतिमा की स्थापना के साथ मंदिर का विकास होता गया। बताया जाता है कि इसके बाद कोलकाता के एक वैश्य परिवार की महिला ने गंगा के रास्ते नई प्रतिमा यहां भेजकर स्थापित कराई थी। मंदिर की सबसे खास परंपरा मन्नत का ताला चढ़ाने की है। श्रद्धालु मनोकामना लेकर ताले का पूजन करते हैं और उसे मंदिर परिसर में बंद कर देते हैं। ताले की एक चाबी भक्त अपने पास रखते हैं, जबकि दूसरी मां के दरबार में रहती है। भक्तों को विश्वास है कि मां उनकी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। मंदिर में पहले बलि देने की परंपरा भी थी। मान्यता है कि मां के खड्ग का जल ग्रहण करने से असाध्य रोगों में भी राहत मिलती है। नवरात्र की सप्तमी पर मां कालरात्रि के दर्शन के लिए यहां हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।

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