टूंडला। भाद्रपद पूर्णिमा से प्रारंभ हुए पितृपक्ष के साथ ही पितरों की तृप्ति के लिए हिंदू परिवारों के मुखियाओं की ओर से पितरों को जलतर्पण किया गया। पितरों को जल तर्पण के साथ ही ब्राह्मणों आदि को भोजन कराया और दान किया। पितृपक्ष शुरू होने के साथ ही नए कार्य, व्यवसाय आदि करने पर अमावस्या तक विराम लग गया। हिंदू समाज में पितृपक्ष का अलग ही महत्व है। पितरों को संतृप्त करने के लिए पुत्रों की ओर से जो दान, पुण्य, भोजन आदि अर्पित करते हैं। इसे प्राप्त कर पितर आत्माएं अपनी संतानों की खुशहाली और संपन्नता के लिए आशीर्वाद देतीं हैं। इस दौरान पितरों के प्रति अनुष्ठान करने वाले पितृपक्ष में न तो सेविंग व कटिंग कराते हैं और न ही तंबाकू, पान, मांस, मदिरा आदि का सेवन करते हैं। पितृपक्ष की तैयारियां लोगों ने पहले ही कर रखीं थीं। इसके लिए ब्राह्मणों को कई दिन पूर्व ही आमंत्रित कर दिया गया था। शनिवार सुबह पितरों को प्रसन्न करने के लिए घरों में पितरों की पसंद के भोजन तैयार किए गए। घर के मुखिया की ओर से पितरों को जल तर्पण करने के बाद गाय,कौआ व कुत्ते को ग्रास दिया गया। इसके उपरांत ब्राह्मण को भोजन कराकर दान दिया। कुछ परिवार के लोगों ने गरीबो को भोजन कराया तो वहीं कुछ लोगों ने संतों व मंदिर पहुंचकर लोगों को भोजन कराया।