बदलते परिवेश व डिजिटल युग में टेसू व झांझी इतिहास की एक धुंधली कहानी बनकर रह गए हैं। हालांकि विलुप्त हो रही यह प्राचीन परंपरा ब्रज के गांवों के बच्चों के बीच जीवंत बनी हुई है। विजय दशमी पर रावण के अंत के साथ बुधवार से ब्रज के गांवों में महाभारत से जुड़ी टेसू झांझी की लोक परम्परा शुरू होगी। गांव, कस्बों की गलियों में बच्चों की टोलियां 'मेरा टेसू यहीं अड़ा, खाने को मांगे दही बड़ा' आदि गीत गाते हुए निकलेंगी। बेटियां भी घर के आंगन में नाच मेरी झिंझरिया..... झांझी के गीत गुन गुनाएंगी। जो शरद पूर्णिमा पर टेसू झांझी के विवाह के साथ सम्पन्न होगी। मंगलवार को बाह, जरार, जैतपुर, बटेश्वर, भदरौली आदि बाजारों में टेसू झांझी की दुकानें सज गई हैं। खरीदारी भी खूब हुई। बीते एक महीने से कुम्हारी कला से जुड़े परिवार टेसू झांझी बनाने और रंगने में जुटे हुए थे, रामदास, कौशलेन्द्र ने अच्छी बिक्री होने पर खुशी का इजहार किया। जरार की मीना, गीता ने बताया कि टेसू झांझी की लोक परम्परा का निर्वहन गांव, कस्बों में खूब होता है। यही वजह है कि शरद पूर्णिमा तक अच्छी खासी कमाई हो जाती है।